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Monday, 10 February 2014

पक्षियों की गणना का वैश्विक कार्यक्रम द ग्रेट बैकयार्ड बर्ड काउंट (जीबीबीसी)

जीबीबीसी

पक्षियों की गणना का वैश्विक कार्यक्रम द ग्रेट बैकयार्ड बर्ड काउंट (जीबीबीसी) आगामी 14 फरवरी से 17 फरवरी तक चलेगा। इस दौरान दुनिया भर के हर उम्र के पक्षी प्रेमी अपने आसपास के इलाकों में मौजूद पक्षियों की गणना कर उसके बारे जानकारियां जीबीबीसी के वेबसाइट पर ऑनलाइन रिकॉर्ड करा पाएंगे। 

चूंकि इस वर्ष यह कार्यक्रम वेलेंटाइन दिवस के दिन शुरू हो रहा है, इसलिए पक्षियों के प्रति प्रेम जताने का इससे अच्छा अवसर नहीं हो सकता। 

आखिर हमारे आसपास भी विविध तरह के पक्षी रहते ही हैं। वर्ष 1998 से प्रचलित यह कार्यक्रम आम आदमियों को मौका देता है कि वे पक्षी वैज्ञानिकों को पक्षियों के बारे में अनुसंधान करने के लिए सहयोग दें। इस परियोजना की शुरुआत कॉरनेल विश्वविद्यालय के पक्षीविज्ञान प्रयोगशाला एवं नेशनल अडोबॉन सोसाइटी नामक एक अमेरिकी पर्यावरण संगठन ने की थी।

 यह आम नागरिकों की वैज्ञानिक गतिविधियों का कार्यक्रम है, जिसके लिए किसी अनुभव या पक्षियों के बारे में गहन जानकारी की जरूरत नहीं है। पिछले वर्ष 111 देशों के नागरिकों ने जीबीबीसी में हिस्सा लिया था, जिसमें भारत से 467 परीक्षण सूची जमा कराई गई थी।

 पिछले वर्ष पक्षियों की प्रजातियों के मामले में भारत का स्थान तीसरा था, जहां 544 प्रजाति के पक्षी देखे गए। सबसे ज्यादा प्रजाति (645) मैक्सिको में और उसके बाद अमेरिका (638) में दर्ज की गई। इस कार्यक्रम का फायदा यह होता है

 कि पक्षी वैज्ञानिक इन आंकड़ों के आधार पर यह पता लगा पाते हैं कि पक्षियों की आबादी पर जलवायु परिवर्तन का क्या असर पड़ रहा है और किस तरह से दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कुछ बीमारियां पक्षियों को प्रभावित कर रही हैं।

Sunday, 9 February 2014

ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल)

टीकेडीएल

पिछले कुछ वर्षों से चीन की दवा कंपनियों द्वारा भारत के औषधीय पौधों के पेटेंट कराने की कोशिशों को ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल) ने नाकाम कर दिया है। 

यह संस्था पारंपरिक ज्ञान, खासकर औषधीय पौधों और भारतीय चिकित्सा पद्धति में उनके उपयोग के ज्ञान का डिजिटल भंडार है। इसकी स्थापना वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय एवं आयुष विभाग के सहयोग से वर्ष 2001 में की गई थी। इसका लक्ष्य देश के प्राचीन एवं पारंपरिक ज्ञान को अनैतिक पेटेंट एवं जैव वैज्ञानिक चोरी से बचाना है

 इसके अलावा इसका गैर पेटेंट डाटाबेस पारंपरिक ज्ञान पर आधारित आधुनिक अनुसंधान को बढ़ावा देता है। इस डाटाबेस के माध्यम से अनुसंधानकर्ताओं के लिए इलाज के विशाल ज्ञान भंडार तक पहुंच सुलभ हो जाती है। चूंकि हमारे देश का ज्यादातर पारंपरिक ज्ञान संस्कृत, उर्दू, फारसी एवं तमिल में उपलब्ध है, इसलिए डाटाबेस तैयार करने के लिए उन्हें पांच अंतरराष्ट्रीय भाषाओं (अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, स्पैनिश और जापानी) में अनूदित किया गया। 

मई, 2010 तक टीकेडीएल ने आयुर्वेद के 85,500, यूनानी के 1,20,200 एवं तमिल सिद्ध के 13,470 सूत्रों के रूपांतरण का काम पूरा कर लिया था। योग के 1098 आसनों को भी डाटाबेस में डाला गया है। इस तरह कुल 2,20,268 औषधीय सूत्रों को डाटाबेस में डाला गया है।

 इसके अलावा टीकेडीएल ने पारंपरिक भारतीय ज्ञान को बचाने के लिए यूरोपीय पेटेंट ऑफिस, यूनाइटेड किंगडम ट्रेडमार्क ऐंड पेटेंट ऑफिस और यूनाइटेड स्टेट्स पेटेंट ऐंड ट्रेडमार्क ऑफिस जैसी अंतरराष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों से समझौता किया है, ताकि वे किसी को पेटेंट मंजूरी देने से पहले टीकेडीएल के डाटाबेस से उसे जांच लें।

Thursday, 6 February 2014

मशहूर हास्य कलाकार चार्ली चैप्लिन का अब तक अज्ञात लघु उपन्यास फूटलाइट्स

फुटलाइट्स

मशहूर हास्य कलाकार चार्ली चैप्लिन का अब तक अज्ञात लघु उपन्यास फूटलाइट्स शीघ्र ही पाठकों के हाथों में आने वाला है। इस उपन्यास की कथावस्तु वही है, जो 1952 में प्रदर्शित उनकी फिल्म लाइटहाउस की है- एक बूढ़े, शराबी विदूषक कॉलवेरो और बैलेरिना नामक एक हताश लड़की की कहानी, जिसे वह बूढ़ा विदूषक आत्महत्या करने से बचाता है।

चौंतीस हजार शब्दों का यह लघु उपन्यास चैप्लिन ने 1948 में तब लिखा था, जब उनका बुरा दौर चल रहा था। चैप्लिन फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन के पहले निदेशक जे एडगर हूवर के निशाने पर थे, जिन्होंने पूरे मध्य अमेरिका को उनके खिलाफ कर दिया था।

 एक युवा अभिनेत्री ने उन्हें अपने बच्चे का पिता बताकर उनके खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया था। हालांकि चैप्लिन ने इन्कार किया था, लेकिन अदालत ने उन्हें उस बच्चे का पिता करार दिया था। यह उस व्यक्ति के लिए एक बड़ा सदमा था, जो तीस वर्षों तक दुनिया का सबसे प्यारा कलाकार माना जाता था। कॉलवेरो की कहानी के बहाने चैप्लिन ने इस अनुभूति को पुस्तक में दर्ज किया है।


करीब छह दशक से चैप्लिन के आर्काइव में पड़े इस लघु उपन्यास की हस्तलिखित एवं टाइप की हुई पांडुलिपि को समेटकर प्रकाशित कराने का बीड़ा उठाया उनके जीवनीकार डेविड रॉबिन्सन ने। फुटलाइट्स में चैप्लिन के लंदन में बिताए बचपन, संघर्ष एवं प्रथम विश्वयुद्ध की झांकी भी मिलती है। 

यह एक ऐसे हास्य कलाकार की कहानी है, जिसे दर्शकों ने भुला दिया है और जिसे प्रेस भी पूर्व कॉमेडियन के रूप में संबोधित करता है, बिल्कुल चैप्लिन की तरह। साथ ही, इस पुस्तक में कलाकार एवं दर्शकों के संबंध और कला के मतलब के बारे में भी बताया गया है।

Wednesday, 5 February 2014

फैबियन सोशलिज्म

फैबियन सोशलिज्म

इन दिनों रियायत की राजनीति को लेकर बहस छिड़ी हुई है। बाजार के पैरोकारों का मानना है कि अब फैबियन सोशलिज्म का रास्ता छोड़कर देश के आर्थिक विकास की नई इबारत लिखने के लिए बाजार को एक मौका देना चाहिए। फैबियन सोशलिज्म समाजवाद की विकासमूलक विचारधारा है, जो मार्क्स एवं लेनिन की क्रांतिकारी विचारधारा से अलग है। 

यह आर्थिक गतिविधियों में एक प्रभावी, निष्पक्ष प्रशासित राज्य की नियमित भागीदारी की वकालत करती है। इस विचारधारा की उत्पत्ति ब्रिटेन की फैबियन सोसाइटी से हुई है। फैबियन सोसाइटी का नाम रोमन जनरल फैबियस मैक्सिमस के नाम पर रखा गया था, जो लड़ाई के मैदान में सीधे मुकाबला करने के बजाय दुश्मनों को धैर्यपूर्वक उत्पीड़ित करके विजय पाने की रणनीति में विश्वास करते थे। फैबियन समाजवादी चरणबद्ध तरीके से राजनीतिक एवं आर्थिक सुधार के हामी थे। 

एक वाक्य में कहें, तो यह कानून के दायरे में क्रमिक सुधारों के जरिये लोकतांत्रिक समाजवाद की स्थापना की वकालत करने वाली विचारधारा है। फैबियन सोशलिज्म का प्रमुख उद्देश्य सत्ता, धन और अवसरों की समानता को बढ़ावा देना, सामूहिक कार्य एवं सार्वजनिक सेवाओं को प्रोत्साहित करना, एक जवाबदेह, सहिष्णु एवं सक्रिय लोकतंत्र की स्थापना करना और स्वतंत्रता, मानवाधिकार, सतत विकास एवं बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है।

 फैबियन समाजवाद के काम करने का ठेठ तरीका है, निजी उद्योगों को चरणबद्ध तरीके से राष्ट्रीयकृत करना और अंततः पूरी अर्थव्यवस्था पर राज्य का नियंत्रण स्थापित करना। जवाहरलाल नेहरू फैबियन सोशलिज्म से काफी प्रभावित थे, इसलिए उनकी आर्थिक नीतियों पर फैबियन सोशलिज्म का स्पष्ट प्रभाव दिखता है।

Tuesday, 4 February 2014

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद (सीसीपीसी)

सीसीपीसी
केंद्रीय मंत्री के वी थॉमस की अध्यक्षता वाली केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद (सीसीपीसी) ने धोखा देनेवाले विज्ञापनों से निपटने के लिए एक उप समिति बनाने का फैसला किया है, जो नियमित रूप से भ्रामक विज्ञापनों पर निगरानी रखेगी, और कंपनियों के साथ-साथ उत्पाद का विज्ञापन करने वाली सेलिब्रिटी को भी मुआवजा देने के लिए कह सकती है। 

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद केंद्र सरकार द्वारा स्थापित निकाय है, जिसका गठन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा चार के तहत किया गया है। इसके अध्यक्ष उपभोक्ता मामलों के मंत्री होते हैं और सरकारी व गैर सरकारी प्रतिनिधि, जिनमें केंद्र एवं राज्य सरकारों, उपभोक्ता संगठनों, एवं बुद्धिजीवी वर्ग के लोग शामिल होते हैं, इसके सदस्य होते हैं।

 सीसीपीसी का उद्देश्य है कि जीवन एवं संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले उत्पादों एवं सेवाओं के विपणन के खिलाफ उपभोक्ताओं के हितों को संरक्षित किया जाए। उत्पादों की गुणवत्ता, मात्रा, शुद्धता, मानक एवं मूल्य के मामले में उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण सुनिश्चित करना इसका लक्ष्य है। 

अनुचित व्यापारिक कार्यों से उपभोक्ताओं की सुरक्षा के अलावा प्रतियोगी मूल्यों पर वस्तुओं को उपलब्ध कराने की व्यवस्था करना तथा उपभोक्ताओं को जागरूक करने और उचित मंचों (फोरम) पर उनकी बात सुने जाने का भरोसा दिलाने के अलावा अनुचित व्यापारिक व्यवहार एवं उत्पीड़न की स्थिति में उन्हें उचित मुआवजा दिलाना भी इस परिषद का उद्देश्य है।

 केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद की तरह विभिन्न राज्यों में भी राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद हैं। देश में उपभोक्ताओं से संबंधित विवादों के निपटारे के लिए जिला, राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर फोरम एवं आयोग हैं।